गणेश जी को बतानी है दिल की बात तो चिट्ठी भेजो इस पते पर..

August 19, 20171min11120

गणेश जी को बतानी है दिल की बात तो चिट्ठी भेजो इस पते पर..

रणथंभौर गणेश मंदिर: 
कोई भी शुभ काम करने से पहले भगवान गणेश की पूजा अच्छा शकुन माना जाता है, लेकिन हमारे देश में एक मंदिर ऐसा भी है जहां भगवान को हर शुभ काम से पहले चिट्ठी भेजकर निमंत्रित किया जाता है। इस गणेश मंदिर में हर समय भगवान के चरणों में चिठ्ठियों और निमंत्रण पत्रों का ढेर लगा रहता है। मंदिर की मान्यता है कि चिट्टी भेजने से भगवान उनकी सुनकर हर परेशानी दूर हो कर देते हैं. लोग अपने मांगलिक कार्य करने से से पहले भी गणेश जी को
कार्ड जरूर भेजते है

गणेश जी को चिट्ठी इस पते पर…


यह देश के कुछ उन मंदिरों में से है जहां भगवान के नाम डाक आती है. देश के कई लोग अपने घर में होने वाले हर मंगल कार्य का पहला कार्ड यहां भगवान गणेश के नाम भेजते हैं. कार्ड पर पता लिखा जाता है- ‘श्री गणेश जी, रणथंबौर का किला, जिला- सवाई माधौपुर (राजस्थान)’. डाकिया भी इन चिट्ठियों को पूरी श्रद्धा और सम्मान से मंदिर में पहुंचा देता है.इसके बाद पुजारी चिट्ठियों को भगवान गणेश के सामने पढ़कर उनके चरणों में रख देते हैं. मान्याता है कि इस मंदिर में भगवान गणेश को निमंत्रण भेजने से सारे काम अच्छी तरह पूरे हो जाते हैं.

विराजते हैं त्रिनेत्री भगवान गणेश

यहां भगवान गणेश की मूर्ति बाकी मंदिरों से कुछ अलग है. मूर्ति में भगवान की तीन आंखें हैं. गणेश जी अपनी पत्नी रिद्धि, सिद्धि और अपने पुत्र शुभ-लाभ के साथ विराजमान हैं. गणनायक का वाहन चूहा भी साथ में है. यहां गणेश चतुर्थी पर धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है और विशेष पूजा अर्चना की जाती है.

मंदिर की दूरी
सवाई माधोपुर जिला मुख्यालय से 13 किलोमीटर दूर रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के भीतर विश्व विरासत में शामिल रणथंभोर दुर्ग में भगवान गणेश का ऐतिहासिक महत्त्व वाला प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर में जाने के लिए लगभग 1579 फीट ऊँचाई पर भगवान गणेश के दर्शन हेतु जाना पड़ता है। भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी को भक्तों की भीड़ के चलते रणथम्भौर की अरावली व विंध्याचल पहाड़ियाँ गजानन के जयकारों से गुंजायमान रहती है। भगवान त्रिनेत्र गणेश की परिक्रमा 7 किलोमीटर के लगभग है। जयपुर से त्रिनेत्र गणेश मंदिर की दूरी 142 किलोमीटर के लगभग है।

प्रतिमा का इतिहास
महाराजा हम्मीरदेव चौहान व दिल्ली शासक अलाउद्दीन खिलजी का युद्ध 1299-1301 ईस्वी के बीच रणथम्भौर हुआ। उस समय अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर के दुर्ग को चारों तरफ से घेर लिया था, नौ माह से भी अधिक रणथम्भौर दुर्ग चारों तरफ से मुगल सेना से घिरा हुआ होने के कारण रणथम्भौर दुर्ग में रसद सामग्री शन: शन: खत्म होने लगी, उस समय महाराजा हम्मीरदेव चौहान को स्वप्न में गणेश जी ने कहाँ कि मेरी पूजा करो तुम्हें मैं चिंतामुक्त कर दूंगा। राजा हम्मीरदेव ने गणेश द्वारा इंगित स्थान पर मूर्ति की पूजा की। किंवदंती के अनुसार भगवान राम ने जिस स्वयंभू मूर्ति की पूजा की थी उसी मूर्ति को हम्मीरदेव ने यहाँ पर प्रकट किया। भगवान राम ने लंका कूच करते समय इसी गणेश का अभिषेक कर पूजन किया था। अत: त्रेतायुग में यह प्रतिमा रणथम्भौर में स्वयंभू रूप में स्थापित हुई और लुप्त हो गई।

प्रथम गणेश
एक और मान्यता के अनुसार जब द्वापर युग में भगवान कृष्ण का विवाह रूकमणी से हुआ था तब भगवान कृष्ण गलती से गणेश जी को बुलाना भूल गए जिससे भगवान गणेश नाराज हो गए और अपने मूषक को आदेश दिया की विशाल चूहों की सेना के साथ जाओं और कृष्ण के रथ के आगे सम्पूर्ण धरती में बिल खोद डालो। इस प्रकार भगवान कृष्ण का रथ धरती में धँस गया और आगे नहीं बढ़ पाये। मूषकों के बताने पर भगवान श्रीकृष्ण को अपनी गलती का अहसास हुआ और रणथम्भौर स्थित जगह पर गणेश को लेने वापस आए, तब जाकर कृष्ण का विवाह सम्पन्न हुआ। तब से भगवान गणेश को विवाह व मांगलिक कार्यों में प्रथम आमंत्रित किया जाता है। यही कारण है कि रणथम्भौर गणेश को भारत का प्रथम गणेश कहते है।
 परिवार के साथ है विराजमान
कहा जाता है कि पूरी दुनिया में यह एक ही मंदिर है जहाँ भगवान गणेश जी अपने पूर्ण परिवार, दो पत्नी- रिद्दि और सिद्दि एवं दो पुत्र- शुभ और लाभ, के साथ विराजमान है। भारत में चार स्वयंभू गणेश मंदिर माने जाते है, जिनमें रणथम्भौर स्थित त्रिनेत्र गणेश जी प्रथम है। इस मंदिर के अलावा सिद्दपुर गणेश मंदिर गुजरात, अवंतिका गणेश मंदिर उज्जैन एवं सिद्दपुर सिहोर मंदिर मध्यप्रदेश में स्थित है। कहाँ जाता है कि महाराजा विक्रमादित्य जिन्होंने विक्रम संवत् की गणना शुरू की प्रत्येक बुधवार उज्जैन से चलकर रणथम्भौर स्थित त्रिनेत्र गणेश जी के दर्शन हेतु नियमित जाते थे, उन्होंने ही उन्हें स्वप्न दर्शन दे सिद्दपुर सीहोर के गणेश जी की स्थापना करवायी थी।

गणेश मंदिर में आरती पूजा
भगवान गणेश के मंदिर में पुजारी द्वारा विधिवत पूजा की जाती है। इसमें पुराणोंक्त एवं वेदोक्त दोनों ही प्रकार के मंत्रों को शामिल किया जाता है। भगवान त्रिनेत्र गणेश की प्रतिदिन पांच आरतियां की जाती है।
पहली आरती प्रात: 07:30 बजे।
दूसरी आरती प्रात: 09:00 बजे। इस आरती को भगवान गणपति की शृंगार आरती कहते है।
तीसरी आरती दोपहर 12:00 बजे। यह भगवान की भोग आरती कहलाती है।
चौथी आरती संध्या समय की प्रार्थना के बाद होने वाली आरती है।
पाँचवीं या अंतिम आरती रात्रि 08:00 बजे होती है जिसे भगवान गणपति की शयन आरती कहते हैं।
भाद्रपद शुक्ल की गणेश चतुर्थी को त्रिनेत्र गणेश जी की आरती व अभिषेक का विशेष महत्त्व माना जाता है। इस दिन सुबह 04:00 बजे भगवान गणपति की मंगला आरती व अभिषेक किया जाता है, साढ़े सात बजे आरती, नौ बजे अभिषेक व शृंगार आरती, दोपहर 12:00 बजे भगवान गणेश की जन्मोत्सव की विशेष झाँकी व महाआरती और प्रसाद वितरण, शाम को आरती व रात्रि को भगवान के दरबार में रात्रि जागरण होता है।

भगवान गणेश का शृंगार
रणथम्भौर दुर्ग में स्थित भगवान त्रिनेत्र गणेश का शृंगार भी विशिष्ट प्रकार से किया जाता है। भगवान गणेश का शृंगार सामान्य दिनों में चाँदी के वरक से किया जाता है, लेकिन गणेश चतुर्थी पर भगवान का शृंगार स्वर्ण के वरक से होता है, यह वरक मुम्बई से मंगवाया जाता है। कई घंटे तक विधि-विधान से भगवान का अभिषेक किया जाता है वही भगवान त्रिनेत्र गणेश जी की पोशाक जयपुर में तैयार करवायी जाती है। भगवान गणेश की झाँकी पर महाआरती मे दुर्ग परिसर में उगी घास की सफेद सीखियों को काम में लिया जाता है, इन सीखियों पर रूई (कपास) लपेट कर व घी में डुबोकर आरती की जाती है।( photo courtesy aajtak.indiatoday)

 





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