भगवान श्रीकृष्ण के महारास का गुप्त रहस्य

October 2, 20171min6500

शरद पूर्णिमा पर गोपियों के संग महारास (Maharas with Gopis on Sharad Purnima)

शरद पूर्णिमा पर  सोलह कलाओं से पूर्ण श्वेत धवल रोशनी से चकाचौंध चंद्रमा आसमान में दिखेगा. इस दौरान धार्मिक नगरी वृन्दावन में मंदिर, आश्रम, मठ और घर-घर ठाकुरजी श्वेत-धवल वस्त्र धारण कर चंद्रमा की रोशनी में भक्तों को दर्शन देंगे. कहते है कि शरद पूर्णिमा पर  भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज गोपियाें के साथ वंशीवट पर चंद्रमा की धवल चांदनी में महारास किया था. जिसके दर्शनों की अभिलाषा देवलोक में बैठे देवताओं की भी रही. महारास के दर्शन करने की हठ ने भगवान भोलेनाथ को गोपी रूप रखने को मजबूर कर दिया.

शरद पूर्णिमा पर हर साल वृंदावन में बांकेबिहारी मंदिर, राधाबल्लभ मंदिर, राधादामोदर मंदिर, राधाश्यामसुंदर मंदिर, मदनमोहन, गोविंददेव, गोपीनाथ, राधारमण, इस्कॉन, प्रेम मंदिर सहित अनेक मंदिरों में विशेष पर्व आयोजित किये जाते हैं. चंद्रमा की धवल चांदनी में रात में ठाकुरजी को खीर का प्रसाद लगाया जाएगा. शरद पूर्णिमा पर खीर का प्रसाद लगाने की प्राचीन परंपरा है.

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यूँ कहलाता है श्रीकृष्ण का महारास (the-secret-of-sri krishna-maharas)

ज्योतिषों के मतानुसार पूरे साल भर में केवल इसी दिन भगवान चंद्रदेव अपनी सोलह कलाओं के साथ परिपूर्ण होते हैं. कहते हैं इसी मनमोहक रात्रि पर भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के संग रास रचाया था. महारास को शरद पूर्णिमा के दिन घटी सबसे बड़ी आध्यात्मिक घटना माना जाता है.

भगवान श्रीकृष्ण का महारास आध्यात्मिक और लौकिक दोनों दृष्टियों से एक परम रहस्य है. आध्यात्मिक लोग इसे भगवान का अपने भक्त गोपियों पर किया गया अनुग्रह मानते हैं. श्रीकृष्ण के महारास का विशद् वर्णन रासपंचाध्यायी में मिलता है.

वर्णन के अनुसार शरदकाल की पूर्णिमा के दिन भगवान श्री कृष्ण ने अपनी बांसुरी के मधुर ध्वनि के जरिए गोपियों का आह्वान किया.  बांसुरी की मधुर तान सुनकर गोपियां गृहस्थी के अपने समस्त कार्यो को छोड़कर श्रीकृष्ण की तरफ चल पड़ीं . अपने पास पहुंचने पर भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के मनोभाव की परीक्षा ली. यह परखने के लिए कि कहीं यह गोपियां कामवश तो यहां नहीं पहुंची हैं,उन्होंने सतीत्व का उपदेश दिया. श्रीकृष्ण कहते हैं कि-

दुःशीलो दुर्भगो वृद्धो जडो रोग्यधनोपि वा।
पतिःस्त्रीभर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी।।

अर्थात यदि पति पातकी न हो तो दुःशील, दुर्भाग्यशाली, वृद्ध, असमर्थ, रोगी और निर्धन होने पर भी इहलोक और परलोक में सुख चाहने वाली रमणी को उसका परित्याग नहीं करना चाहिए. इसके आगे भगवान श्रीकृष्ण फिर कहते हैं-

अस्वर्ग्यमशस्यं च फल्गु कृच्छ्रं भयावहम्।
जुगुप्सितं च सर्वत्र हौपपत्यं कुलस्त्रियाः।।

कुलनारी का अन्य पुरुषों के साथ रहना अत्यंत नीच कार्य है और कष्टप्रद तथा भयावह है. अन्य पुरुषों के साथ रहने वाली स्त्रियों को यश नष्ट हो जाता है,सुख समाप्त हो जाता है और वह अपयश की भागी बनती है. भगवान श्रीकृष्ण के सतीत्व संबंधी वचनों के बाद गोपियों ने जो जवाब दिया है उससे यह स्पष्ट होता है कि महारास कामक्रीड़ा नहीं हैं.

गोपियां कहती हैं कि पति पालन-पोषण करता है और पुत्र नरक से तारता है . लेकिन पुत्र और पति यह भूमिकाएं अल्पकाल तक ही निभाते हैं. आप तो जन्म-जन्मांतरों तक व्यक्ति के पालन पोषण का कार्य करते हैं और स्वर्ग के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं. इसलिए हे श्याम!हमारी परीक्षा मत लीजिए. इसके बाद गोपियां मण्डलाकार खड़ी हो जाती हैं और योगेश्वर श्रीकृष्ण मंडल में प्रवेश कर प्रत्येक दो गोपियां के बीच प्रकट हुए और सभी गोपियों के साथ रासोत्सव किया.

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