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March 9, 20181min5030

 

चैत्र नवरात्रि की अवधि में अखंड दीप जलाने का विशेष महत्व है. मान्यता है कि जिस घर में अखंड दीप जलता है वहां माता दुर्गा की विशेष कृपा होती है। लेकिन अखंड दीप जलाने के कुछ नियम हैं, इसमें अखंड दीप जलाने वाले व्यक्ति को जमीन पर ही बिस्तर लगाकर सोना पड़ता है। किसी भी हाल में जोत बुझना नहीं चाहिए और इस दौरान घर में भी साफ सफाई का खास ध्यान रखा जाना चाहिए। दुर्गा सप्तशती के अनुसार माता दुर्गा नवरात्र में नौ दिनों तक अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। नवरात्र के नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है.

कलश स्थापना का विधान

विधि-विधान से पूजन-अर्चन व जप करने पर साधक के लिए कुछ भी अगम्य नहीं रहता। विधान- कलश स्‍थापना, देवी का कोई भी चित्र संभव हो तो यंत्र प्राण-प्रतिष्ठायुक्त तथा यथाशक्ति पूजन-आरती इत्यादि तथा रुद्राक्ष की माला से जप संकल्प आवश्यक है। जप के पश्चात अपराध क्षमा स्तोत्र यदि संभव हो तो अथर्वशीर्ष, देवी सूक्त, रात्र‍ि सूक्त, कवच तथा कुंजिका स्तोत्र का पाठ पहले करें। गणेश पूजन आवश्यक है। ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन करने से सिद्धि सुगम हो जाती है.

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कलश स्थापना की विधि –

कलश स्थापना के लिए सबसे पहले जौ को फर्श पर डालें, उसके बाद उस जौ पर कलश को स्थापित करें। फिर उस कलश पर स्वास्तिक बनाएं उसके बाद कलश पर मौली बांधें और उसमें जल भरें। कलश में अक्षत, साबुत सुपारी, फूल, पंचरत्न और सिक्का डालें.

ये है घटस्थापना की विधि

माता की मूर्ति या तस्वीर के सामने कलश मिट्टी के ऊपर रखकर हाथ में अक्षत, फूल, और गंगाजल लेकर वरुण देव का आह्वान करें। कलश में सर्वऔषधी एवं पंचरत्न डालें। कलश के नीचे रखी मिट्टी में सप्तधान्य और सप्तमृतिका मिलाएं। आम के पत्ते कलश में डालें। कलश के ऊपर एक पात्र में अनाज भरकर इसके ऊपर एक दीप जलाएं। कलश में पंचपल्लव डालें इसके ऊपर एक पानी वाला नारियल रखें जिस पर लाल रंग का वस्त्र लपिटा हो। अब कलश के नीचे मिट्टी में जौ के दानें फैला दें। इसके बाद देवी का ध्यान करें-

खडगं चक्र गदेषु चाप परिघांछूलं भुशुण्डीं शिर:, शंखं सन्दधतीं करैस्त्रि नयनां सर्वांग भूषावृताम।

नीलाश्म द्युतिमास्य पाद दशकां सेवे महाकालिकाम, यामस्तीत स्वपिते हरो कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम॥

 

Achary Rajesh Kumar rajpra.infocom@gmail.com


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March 4, 20181min6570

चैत्र नवरात्रि  (Chaitra Navratri ) 18 मार्च 2018 से आरंभ होकर 26 मार्च 2018 तक है. यदि आप भी घर में मां दुर्गा के आशीर्वाद से सुख एवं समृद्धि पाना चाहते हैं तो  शुभ मुहूर्त में घर में नवरात्रि कलश की स्थापना करें .  ज्योत‌िष की दृष्ट‌ि से चैत्र नवरात्रि का व‌‌िशेष महत्व है क्योंक‌ि इस नवरात्रि के दौरान सूर्य का राश‌ि पर‌िवर्तन होता है.

सूर्य 12 राश‌ियों में भ्रमण पूरा करते हैं और फ‌िर से अगला चक्र पूरा करने के ल‌िए पहली राश‌ि मेष में प्रवेश करते हैं। सूर्य और मंगल की राश‌ि मेष दोनों ही अग्न‌ि तत्व वाले हैं इसल‌िए इनके संयोग से गर्मी की शुरुआत होती है। चैत्र नवरात्रि से नववर्ष के पंचांग की भी गणना शुरू होती है.

चैत्र नवरात्रि घटस्थापना

घटस्थापना मुहूर्त = 06:31 से 07:46
अवधि = 1 घण्टा 15 मिनट

घटस्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि पर निर्धारित है

प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ: 17 मार्च 2018 को 18:41 बजे से
प्रतिपदा तिथि समाप्त: 18 मार्च 2018 को 18:31 बजे

चैत्र नवरात्रि में मां शक्ति की आराधना की जाती है. चैत्र नवरात्रि को शक्ति पूजन के लिए विशेष माना गया है. चैत्र नवरात्रि को लेकर ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि से पहले मां आदिशक्ति अवतरित हुई थी. यदि भक्त इन दिनों विधि-विधान से मां की पूजा करते हैं तो मां प्रसन्न होकर अपने भक्तों को सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं.
ध्यान रहे कि नवरात्रि में पूजा और व्रत करने से सालभर ग्रहों की स्थिति अनुकूल रहती है. घटस्थापना कर नवरात्रि की शुरुआत एक निश्चित अवधि के दौरान मुहूर्त देख के ही की जानी चाहिए. घटस्थापना से भगवती दुर्गा का आवाहन कर पूजा के लिए आमंत्रित किया जाता है. हिन्दु शास्त्रों में इस बात का जिक्र है कि गलत समय पर किया जाने वाला आवाहन देवी शक्ति का क्रोध और प्रकोप ला सकता है

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ध्यान रहे कि देवी भागवत् पुराण के अनुसार पूरे वर्ष में चार नवरात्र मनाए जाते हैं ज‌िनमें दो गुप्त नवरात्र सह‌ित शारदीय नवरात्र और बासंती नवरात्र ज‌िसे चैत्र नवरात्र कहते हैं शाम‌िल हैं। दरअसल यह चारों नवरात्र ऋतु चक्र पर आधार‌ित हैं और सभी ऋतुओं के संध‌िकाल में मनाए जाते हैं। शारदीय नवरात्र वैभव और भोग प्रदान देने वाले है। गुप्तनवरात्र तंत्र स‌िद्ध‌ि के ल‌िए व‌िशेष है जबक‌ि चैत्र नवरात्र आत्मशुद्ध‌ि और मुक्त‌ि के ल‌िए। वैसे सभी नवरात्र का आध्यात्म‌िक दृष्ट‌ि से अपना महत्व है।आध्यात्म‌िक दृष्ट‌ि से देखें तो यह प्रकृत‌ि और पुरुष के संयोग का भी समय होता है। प्रकृत‌ि मातृशक्त‌ि होती है इसल‌िए इस दौरान देवी की पूजा होती है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है क‌ि संपूर्ण सृष्ट‌ि प्रकृत‌िमय है और वह स‌िर्फ पुरुष हैं। यानी हम ज‌िसे पुरुष रूप में देखते हैं वह भी आध्यात्म‌िक दृष्ट‌ि से प्रकृ‌त‌ि यानी स्त्री रूप है। स्त्री से यहां मतलब यह है क‌ि जो पाने की इच्छा रखने वाला है वह स्त्री है और जो इच्छा की पूर्त‌ि करता है वह पुरुष है.

नवरात्रि के नौ द‌िनों में मनुष्य अपनी भौत‌िक, आध्यात्म‌िक, यांत्र‌िक और तांत्र‌िक इच्छाओं को पूर्ण करने की कामना से व्रतोपवास रखता है और ईश्वरीय शक्त‌ि इन इच्छाओं को पूर्ण करने में सहायक होती है। इसल‌िए आध्यात्म‌िक दृष्ट‌ि से नवरात्रि का अपना महत्व है.

 ज्योत‌िष की दृष्ट‌ि से व‌‌िशेष महत्व

ज्योत‌िष की दृष्ट‌ि से चैत्र नवरात्रि का व‌‌िशेष महत्व है क्योंक‌ि इस नवरात्रि के दौरान सूर्य का राश‌ि पर‌िवर्तन होता है। सूर्य 12 राश‌ियों में भ्रमण पूरा करते हैं और फ‌िर से अगला चक्र पूरा करने के ल‌िए पहली राश‌ि मेष में प्रवेश करते हैं। सूर्य और मंगल की राश‌ि मेष दोनों ही अग्न‌ि तत्व वाले हैं इसल‌िए इनके संयोग से गर्मी की शुरुआत होती है। चैत्र नवरात्र से नववर्ष के पंचांग की भी गणना शुरू होती है। इसी द‌िन से वर्ष के राजा, मंत्री, सेनापत‌ि, वर्षा, कृष‌ि के स्वामी ग्रह का न‌िर्धारण होता है और वर्ष में अन्न, धन, व्यापार और सुख शांत‌ि का आंकलन क‌िया जाता है। नवरात्र में देवी और नवग्रहों की पूजा का कारण यह भी है क‌ि ग्रहों की स्थ‌ित‌ि पूरे वर्ष अनुकूल रहे और जीवन में खुशहाली बनी रहे। धार्म‌िक दृष्ट‌ि से नवरात्र का अपना अलग ही महत्व है क्योंक‌ि इस समय आद‌िशक्त‌ि ज‌िन्होंने इस पूरी सृष्ट‌ि को अपनी माया से ढ़का हुआ है ज‌िनकी शक्त‌ि से सृष्ट‌ि का संचलन हो रहा है जो भोग और मोक्ष देने वाली देवी हैं वह पृथ्वी पर होती है इसल‌िए इनकी पूजा और आराधना से इच्छ‌ित फल की प्राप्त‌ि अन्य द‌िनों की अपेक्षा जल्दी ‌होती है।

धार्म‌िक दृष्ट‌ि से खास महत्व

चैत्र नवरात्रि का तो धार्म‌िक दृष्ट‌ि से खास महत्व है क्योंक‌ि चैत्र नवरात्रि के पहले द‌िन आद‌िशक्त‌ि प्रकट हुई थी और देवी के कहने पर ब्रह्मा जी को सृष्ट‌ि न‌िर्माण का काम शुरु क‌िया था। इसल‌िए चैत्र शुक्ल प्रत‌िपदा से ह‌िन्दू नववर्ष शुरु होता है। चैत्र नवरात्र के तीसरे द‌िन भगवान व‌‌िष्णु ने मत्स्य रूप में पहला अवतार लेकर पृथ्वी की स्थापना की थी। इसके बाद भगवान व‌िष्णु का सातवां अवतार जो भगवान राम का है वह भी चैत्र नवरात्र में हुआ था। इसल‌िए धार्म‌िक दृष्ट‌ि से चैत्र नवरात्र का बहुत महत्व है.

वैज्ञान‌िक दृष्ट‌ि से भी महत्व

नवरात्रि का महत्व स‌िर्फ धर्म, अध्यात्म और ज्योत‌िष की दृष्ट‌ि से ही नहीं है बल्क‌ि वैज्ञान‌िक दृष्ट‌ि से भी नवरात्र का अपना महत्व है। ऋतु बदलने के ल‌िए समय रोग ज‌िन्हें आसुरी शक्त‌ि कहते हैं उनका अंत करने के ल‌िए हवन, पूजन क‌िया जाता है ज‌िसमें कई तरह की जड़ी, बूट‌ियों और वनस्पत‌ियों का प्रयोग क‌िया जाता है। हमारे ऋष‌ि मुन‌ियों ने न स‌िर्फ धार्म‌िक दृष्ट‌ि को ध्यान में रखकर नवरात्र में व्रत और हवन पूजन करने के ल‌िए कहा है बल्क‌ि इसका वैज्ञान‌िक आधार भी है। नवरात्र के दौरान व्रत और हवन पूजन स्वास्थ्य के ल‌िए बहुत ही बढ़‌िया है। इसका कारण यह है क‌ि चारों नवरात्र ऋतुओं के संध‌िकाल में होते हैं यानी इस समय मौसम में बदलाव होता है ज‌िससे शारीर‌िक और मानस‌िक बल की कमी आती है। शरीर और मन को पुष्ट और स्वस्थ बनाकर नए मौसम के ल‌िए तैयार करने के ल‌िए व्रत क‌िया जाता है.



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