धनतेरस कथा: भगवन विष्णु ने दिलाई असुरों के गुरु के भय से मुक्ति

October 13, 20171min3990

कार्तिक माह की कृष्ण की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है. इस बार यह पर्व 17 अक्टूबर को मनाया जाएगा. इस दिन धनवंतरी भगवान का  जन्म हुआ था, इसलिए इसे धनतेरस कहते है. भगवान धनवंतरी समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए इस दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है.  धनतेरस से जुड़ी कई कथाएं हैं जिनसे पता चलता है कि दीपावली से पहले धनतेरस क्यों मनाया जाता है.

पहली कथा

शास्त्रों के अनुसार धनतेरस के दिन ही भगवान धनवंतरी हाथों में स्वर्ण कलश लेकर सागर मंथन से उत्पन्न हुए. धनवंतरी ने कलश में भरे हुए अमृत से देवताओं को अमर बना दिया. धनवंतरी के प्रगट होने के दो दिनों बाद देवी लक्ष्मी प्रकट हुई. इसलिए दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है
शास्त्रों के अनुसार भगवान धनवंतरी देवताओं के वैद्य हैं. इनकी भक्ति और पूजा से आरोग्य सुख यानी स्वास्थ्य लाभ मिलता है. मान्यता है कि भगवान धनवंतरी विष्णु के अंशावतार हैं. संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने धनवंतरी का अवतार लिया था.

दूसरी कथा

धनतेरस से जुड़ी एक दूसरी कथा है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने के कारण भगवान विष्णु ने असुरों के गुरू शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी थी। कथा के अनुसार, देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया।

वामन भगवान द्वारा मांगी गयी तीन पग भूमि, दान करने के लिए कमण्डल से जल लेकर संकल्प लेने लगे। बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमण्डल में लघु रूप धारण करके प्रवेश कर गये
भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमण्डल में ऐसे रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गयी।

बलि ने संकल्प लेकर तीन पग भूमि दान कर दिया। इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुणा धन-संपत्ति देवताओं को मिल गयी। इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है





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