इसलिए ख़ास होता है हरियाली तीज का व्रत

July 26, 20171min6260

हरियाली तीज का उत्सव श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। ज‍िस समय यह त्‍योहार मनाया जाता है उस समय चारों ओर हर‍ियाली छाई रहती है। ज‍िससे मन में उमंग, आस्‍था और प्रेम का अनोखा संगम होता है।
क्यों मनाई जाती है हरियाली तीज
हरियाली तीज के दिन शिव और पार्वती का पुर्नमिलन हुआ था. ऐसी मान्यता है कि मां पार्वती के 108वें जन्म में उन्हें भगवान शंकर पति के रूप में मिले. इसलिए 107 जन्मों तक मां पार्वती भगवान शंकर को पाने के लिए पूजा करती रहीं. यह कहा जा सकता है कि मां पार्वती को भगवान शिव ने उनके 108वें जन्म में स्वीकारा था.
हरियाली तीज का महत्व
हरियाली तीज की पूजा से जुड़ी कुछ ऐसी गौर करने लायक बातें हैं, जो कि इस व्रत को रखने में बहुत ही मददगार होती है. इस व्रत में हाथों में नई चूड़ियां, पैरों में अल्ता और मेहंदी लगाई जाती है. हम आपको बता दें कि इस दौरान मां पार्वती की पूजा अर्चना की जाती है. इस व्रत में कई जगहों पर मां की प्रतिमा पालकी में बिठाकर झांकी निकाली जाती है इससे पहले महिलाएं नहाकर मां की प्रतिमा को रेशमी वस्त्र और गहने से सजाती हैं. अर्धगोले आकार की माता की मूर्ति बनाती हैं और उसे पूजा के स्थान में बीच में रखकर पूजा करती हैं.

व्रत कथा का है विशेष
पूजा में कथा का विशेष महत्व है, इसलिए हरियाली तीज व्रत कथा जरूर सुननी चाहिए। कथा सुनते वक्त अपने पति का ध्यान करें. हरियाली तीज व्रत में पानी नही पीया जाता. दुल्हन की तरह सजना पड़ता है और हरे कपड़े और जेवर पहनें जाते है . इस दिन मेहंदी लगवाना शुभ माना जाता है.

सोलह श्रृंगार कर होती पूजा

ऐसे में यह व्रत पत‍ि की लंबी आयु, बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य व सुखी दांपत्‍य जीवन के ल‍िए रखा जाता है। इस द‍िन माता पार्वती की पूजा बड़े धूमधाम से होती है। कुंआरी लड़क‍ियां व सुह‍ागि‍न महि‍लाएं सभी हर‍ियाली तीज पर न‍िर्जला व्रत रखती हैं। इस द‍िन सुहाग‍िन महि‍लाओं को सोलह श्रृंगार करके व‍िध‍िव‍िधान से मां पार्वती की पूजा करती है।

भगवान शिव और पार्वती का पुर्नमिलन
हरियाली तीज के दिन शिव और पार्वती का पुर्नमिलन हुआ था। मान्यता है कि मां पार्वती के 108वें जन्म में उन्हें भगवान शंकर पति के रूप में मिले। इसलिए 107 जन्मों तक मां पार्वती भगवान शंकर को पाने के लिए पूजा करती रहीं। यह कहा जा सकता है कि मां पार्वती को भगवान शिव ने उनके 108वें जन्म में स्वीकारा था।

राजस्थान में नई उमंग के साथ 

तीज का पर्व राजस्थान के लिए एक अलग ही उमंग लेकर आता है जब महीनों से तपती हुई मरुभूमि में रिमझिम करता सावन आता है तो निश्चित ही किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होता है, यहाँ तो बक़ायदा कहावत है कि ‘तीज तीवारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर…’ यानी सावनी तीज से आरंभ पर्वों की यह सुमधुर श्रृंखला गणगौर के विसर्जन तक चलने वाली है। सारे बड़े त्योहार तीज के बाद ही आते हैं। चाहे वो रक्षाबंधन-जन्माष्टमी, हो फिर दशहरा, दीपावली।
तीज के एक दिन पहले (द्वितीया तिथि को) विवाहित स्त्रियों के माता-पिता (पीहर पक्ष) अपनी पुत्रियों के घर (ससुराल) सिंजारा भेजते हैं। जबकि कुछ लोग ससुराल से मायके भेजी बहु को सिंजारा भेजते हैं। विवाहित पुत्रियों के लिए भेजे गए उपहारों को सिंजारा कहते हैं, जो कि उस स्त्री के सुहाग का प्रतीक होता है।। तीज के इस त्यौहार पर बनाई और खाई जाने वाली विशेष मिठाई घेवर है। जयपुर का घेवर विश्व प्रसिद्ध है. यहाँ के घेवर के बिना तीज का पर्व अधूरा माना जाता है।

(फ़ोटो साभार दैनिक जागरण  )





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