माँ चिंतपूर्णी मंदिर का रहस्य

June 16, 20171min9800

 

 


त्रिकोण शक्तिपीठ में ज्वाला जी और ब्रजेश्वरी कांगड़ा के साथ चिन्तपूर्णी माता का विशेष माहात्म्य है। देवभूमि हिमाचल के सोला सिग्ही के मनोरम पहाड़ों के बीच छपरोह गांव में विराजती हैं मां । ये स्थान इक्यावन शक्तिपीठों में से एक है ।

चिंतपूर्णी माता अर्थात चिंता को पूर्ण करनेवाली देवी चिंतपूर्णी देवी का यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के जिला ऊनामें स्थित है पंजाब के होशियारपुर से कुछ दुरी पर भरवाई बस अड्डे से लगभग ३ किमी की दूरी पर चिंतपूर्णी देवी का मंदिर है माता के यहाँ पिंडी रूप में पूजा होती है यहाँ पर सती के चरण गिरे थे कहते है की चिंतपूर्णी देवी का एक बार दर्शन मात्र करने से समस्त चिन्ताओ से मुक्ति मिलती है इसे छिन्नमस्तिका देवी भी कहते है श्री मार्कंडेय पुराण के अनुसार जब माँ चंडी ने राक्षसों का संहार करके विजय प्राप्त की तो माता की सहायक योगिनियाँ अजया और विजया की रुधिर पिपासा को शांत करने के लिए अपना मस्तक काटकर, अपने रक्त से उनकी प्यास बुझाई इसलिए माता का नाम छिन्नमस्तिका देवी पड़ गया प्राचीन ग्रंथो के अनुसार छिन्नमस्तिका देवी के निवास के लिए मुख्य लक्षण यह माना गया है की वह स्थान चारों और से शिव मंदिरों
से घिरा रहेगा और यह लक्षण चिंतपूर्णी में शत प्रतिशत सत्य प्रतीत होता है क्योकि चिंतपूर्णी मंदिर के पूर्व में कालेश्वर महादेव,पश्चिम में नर्हारा महादेव,उत्तर में मुच्कुंड महादेव और दक्षिण में शिववाड़ी है मंदिर के प्रांगन में पेड़ के तने पर नाल बाँधकर अपनी मनोकामना देवी से मांगते है
पौराणिक कथाओं के अनुसार शिव तांडव को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने जब मां सती के शरीर को इक्यावन भागों में विभक्त किया तो चिंतपूर्णी में मां के चरण गिरे थे । इसलिए यहां आने वाले भक्तों के लिए माता के चरण स्पर्श का खास महत्व है ।
चिन्तपूर्णी में माता पिण्डी रूप में विद्यमान है। मां की पिण्डी विविध् फूलों से सुसज्जित रखी होती है और उस पर चांदी के छत्रा शोभायमान रहते हैं। चिन्तपूर्णी माता का मन्दिर गुम्बदीय शैली में संगमरमर के पत्थरों से बना है । इसे मां के भक्तों ने बनाया है। गुंबद स्वर्ण मण्डित है और इसपर स्वर्णिम कलश तथा छत्र लगाए गये हैं। मुख्य गुम्बद के साथ ही अग्र भाग में मन्दिर प्रवेश द्वार के ऊपर की ओर छोटा गुम्बद बना है। इस गुम्बद पर हनुमान और भैरव की मूर्तियां संस्थापित हैं।

मन्दिर के सोने और चांदी से मण्डित गर्भ गृह में माता का मूल प्रतीक पिंडी रूप में प्रतिष्ठित है। इसके अतिरिक्त मन्दिर परिसर में वट वृक्ष के टाले पर हनुमान, भैरव और गणपति की पत्थर की मूर्तियां रखी गयी हैं। मुख्य द्वार के पास ही इन देवों की हनुमान, भैरव और गणपति की मूर्तियां हैं। मन्दिर परिसर में पीतल के बने माता के दो वाहन में एक बडा शेर और एक छोटा शेर बनाये गये हैं। इन दोनों के अतिरिक्त एक ओर छोटे शेर पर दुर्गा भगवती भी आरूढ है। यह शेर और माता की मूर्ति भी पीतल धातु की बनी है। यह पूरा मन्दिर परिसर आधुनिक ढंग से संगमरमर के चक्कों से सजाया गया है

चिन्तपूर्णी इस समय कांगड़ा और ऊना जि़ला की संयुक्त सीमा पर स्थित है। मन्दिर का परिसर ऊना में है और उस से नीचे चिन्तपूर्णी बस स्टैण्ड का क्षेत्रा कांगड़ा में है।
पहले यह स्थान भूतपूर्व रियासत अम्ब और डाडासिबा के बीच स्थित थी। दोनों ही राज्यों के राजा मन्दिर को अपने क्षेत्र में मानते थे और इस पर प्रायः झगड़ा होता रहता था। प्रचलित कथा के मुताबिक एक बार समाधान के लिये दोनों राजाओं की ओर से एक-एक बकरा माता के दरबार में लाया गया। शर्त रखी गयी क‍ दोनों बकरों को खुला छोड़ देने पर जिस राजा का बकरा पहले कांपेगा, उसी के क्षेत्र में मन्दिर माना जाएगा। कहा जाता है कि अम्ब राजा का बकरा पहले कांपा और शर्त के अनुसार माता की इच्छा मान कर मन्दिर अम्ब राज्य के क्षेत्र में आ गया… भूतपूर्व अम्ब राज्य इस समय जिला ऊना का एक तहसील है।


भक्त माई दास एवं उनके पुत्र कल्लु के वंशज बारी-बारी से माता की पूजा करते हैं। प्रातः और सायं काल में पूजा-आरती होती है। इससे पहले उसी कुण्ड के जल से माता को स्नान कराया जाता है जहां कि माई दास ने माता के आदेश पर पानी ढूंढा था।

प्रचलित कथा के अनुसार पटियाला रियासत के अठरनामी गांव के रहनेवाले माई दास मां के अनन्य भक्त थे । उन्होने ही इस पवित्र धाम की खोज की थी । तब माता ने सपने में आकर उनकी चिंता का निवारण किया था । मंदिर के पास ही भक्त माईदास का ढूंढ़ा हुआ सरोवर है जिसके जल से वो माता की पूजा किया करते थे । आज भी श्रद्धालु इसी सरोवर से जल लेकर पूजा-अर्चना करते हैं । तलाब तक पहुंचने के लिए दो सौ सीढ़ियां उतरनी पड़ती है । पंडित माईदास की समाधि भी तलाब के पश्चिम दिशा की ओर स्थित है ।

दिन के समय बारह बजे से साढ़े बारह बजे तक मन्दिर बन्द रहता है। मंदिर बन्द करने से पहले माता को खीर, दाल-चावल का भोग चढ़ाया जाता है।

बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुत्र प्राप्ति की कामना के साथ चिंतपूर्णी पहुंचते हैं । बड़ी संख्या में लोग पुत्र-प्राप्ति के पश्चात्‌ उसका मुण्डन संस्कार यहीं आ कर करते हैं। अन्य कामनाओं के लिये भी लोग मां के चरणों में शीश नवाने आते हैं। वे मनौती के प्रति वचनबद्धता हेतु मन्दिर परिसर के वट वृक्ष में प्रायः लाल डोरी का धागा बांधते हैं।

कहते हैं कि चिन्तपूर्णी माता के दर्शन मात्र से तमाम चिंताओं से मुक्ति मिल जाती है ….और भक्तों को आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति होती है ।

कामना से यहां बहुत लोग आते हैं। सरकार द्वारा गठित न्यास मंदिर की सुचारू व्यवस्था देखता है।
पौराणिक कथा के अनुसार यहां पर शिव तांडवके दौरान माता सती के चरण गिर थे। इसलिए भक्तों में माताचरणों का स्पर्श करने को लेकर अगाध श्रद्धा है। चिंतपूर्णी देवीका मंदिर हिमाचल प्रदेश के सोला सिग्ही श्रेणी की पहाड़ी परछपरोह गांव में स्थित है। अब ये स्थान चिंतपूर्णी के नाम से हीजाना जाता है। कहा जाता है चिंतपूर्णी देवी की खोज भक्त माईदास ने की थी। माई दास पटियाला रियासत के अठरनामी गांवके निवासी थे। वे मां के अनन्य भक्त थे। उनकी चिंता कानिवारण माता ने सपने में आकर किया था। मंदिर के पासभक्त माईदास का ढूंढा हुआ सरोवर भी है जिसके जल से वेमाता की नियमित पूजा किया करते थे। अभी भी भक्त इससुंदर तालाब से जल लेकर माता की पूजा करते हैं। तालाब तक जाने के लिए 200 सीढ़ियां उतरनी पड़ती है।मां के मंदिर का मुख्य प्रसाद हलवा है।
नवरात्र में विशाल मेला – चिंतपूर्णी मंदिर में चैत्र और शरद नवरात्र के समय विशाल मेला लगता है। तब यहांलाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। फ़ोटो साभार देवभूमि ब्लॉगर





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