अद्भुत और सबसे धनी मीनाक्षी मंदिर के दर्शन क्यों ज़रूरी है ?

June 17, 20172min9530

मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर….. दक्षिण भारत के सबसे भव्य मंदिरों में से एक है….वैभव ऐसा, कि देखने के बाद कोई भी आश्चर्य चकित रह जाए….. प्रमुख शक्ति पीठों में शामिल देवी मीनाक्षी का ये मंदिर न सिर्फ आस्था का महान केंद्र है बल्कि द्रविड़ स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना भी है …..यही कारण है कि आधुनिक काल के दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल करने के लिए इस मंदिर को भी नामांकित किया गया था।

कई एकड़ में फैला मंदिर बारह विशाल गोपुरमों से घिरा है….इनमें से नौ मंजिलों वाला दक्षिणी गोपुरम सबसे बड़ा है जिसकी उंचाई 170 फीट है । वहीं उत्तर दिशा स्थित गोपुरम की उंचाई सबसे कम 160 फीट है । सभी गोपुरम में देवी-देवताओं ,किन्नरों और गंधर्वों की आकर्षक आकृतियां बनी है ।

भगवान विष्णु के अवतारों की चर्चा और उनका वर्णन पुराणों और धर्मग्रंथों में होती रही है। मगर भगवान शंकर के अवतार का संबंध जिस एक शहर से है वो है मदुरैई। यहां भगवान शिव देवी पार्वती के मीनाक्षी रूप का वरण करने के लिए प्रकट हुए। मदुरै का संबंध सुंदरेश्वर के रूप में भगवान शिव और मीनात्री के रूप में देवी पार्वती के मिलन से हैं।

अद्भुत मंदिर 

मंदिर  के दक्षिणी गोपुरम से प्रवेश करने पर दायीं ओर स्थित है स्वर्णकाल सरोवर । इसके मध्य में एक स्वर्ण कमल बना हुआ है । ऐसी मान्यता है कि देवराज इंद्र ने शिवलिंग की पूजा के लिए जेस सरोवर से कमल लिए थे वह इसी स्थान पर था । यहीं पर बने मंडप से दर्शनार्थी मीनाक्षी देवी के दर्शन के लिए मंदिर में प्रवेश करते हैं ।

मंदिर का एक और बड़ा आकर्षण सहस्त्रस्तंभ मंडप है । इस मंडप में 985 स्तंभ बने हुए हैं जिसकी भव्यता देखते ही बनती है । स्तंभ खास तरह के भित्ति चित्रों से भरे पड़े हैं जिनमें राजकुमारी मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वरर के विवाह के दृश्य हैं।

मंदिर का गर्भगृह करीब 3500 साल पुराना होने का अनुमान लगाया जाता है । हालांकि आधुनिक ढ़ाचे का इतिहास सही-सही पता नहीं चल पाया है परन्तु स्थानीय साहित्य में इसके सातवीं शताब्दी का होने की बात कही गई है। वहीं वर्तमान मंदिर का निर्माण काल सत्रहवीं शताब्दी है । सातवीं शताब्दी में मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की गई थी । परन्तु बाद में इसे मीनाक्षी मंदिर का रुप दिया गया ।

मंदिर के विशाल प्रांगण में शिव मंदिर समूह यानि भगवान सुंदरेश्वरर का मंदिर है । यहां भगवान शिव की नटराज मुद्रा में भी प्रतिमा है । इस प्रतिमा की विशेषता ये है कि इस मुद्रा में भगवान शिव का बायां की जगह दायां पैर उठा हुआ है । कहा जाता है कि राजा राजशेखर पांड्य की विनती पर महादेव ने यहां अपनी मुद्रा बदल ली थी । (आगे की कहानी वीओ में + नटराज की प्रतिमा के आगे गणेश की प्रतिमा)

बायीं ओर मीनाक्षी देवी का मंदिर है । यहां देवी की अत्यंत सुन्दर प्रतिमा है । देवी की मूर्ति के सामने बुध ग्रह है । इसलिए देवी के दर्शन के बाद उस दिशा में पीछे मुड़कर देखते हुए प्रणाम किया जाता है। हरा पत्थर बुध का प्रतीक माना जाता है इसलिए देवी की प्रतिमा मरगत पत्थर से बनाई गई है । कहते हैं यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मन्नतें पूरी होती है । खासकर बुधवार को यहां पूजा करने से विशेष लाभ मिलता है ।

मंडप के पश्चिनी भाग में बने स्तंभ तो शिल्पकला के अदभुद उदाहरण हैं । दुनिया भर में ऐसी कलाकृति कहीं और देखने को नहीं मिलती है । इन स्तंभों की विशेषता ये है कि इन पर थाप देने से अलग-अलग वाद्यों के मधुर स्वर सुनाई देते हैं ।

स्वर्ण पुष्करणी सरोवर

मंडप के नजदीक ही स्वर्ण पुष्करणी सरोवर है । फरवरी माह में देवी मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर की प्रतिमाओं को सजाकर यहां नौका विहार कराया जाता है । कहा जाता है कि यहीं उनका विवाह संपन्न हुआ था । इसलिए इस मौके पर नवविवाहित युगल सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हैं ।

आक्रमणकारियों ने काफी नुकसान पहुंचाया
-हिंदुस्तान के कई प्रसिद्ध मंदिरों की तरह मीनाक्षी मंदिर को भी आक्रमणकारियों ने काफी नुकसान पहुंचाया । 1310 ई,. में मलिक काफूर ने मंदिर को पूरी तरह से नष्ट करने की कोशिश की । लेकिन उस वक्त मंदिर के पुजारियों ने मूल प्रतिमाओं का सुरक्षित बचा लिया । करीब पचास साल बाद मदुरई मुस्लिम आक्रमणकारियों के शासन से मुक्त हुआ । इसके बाद प्रतिमाओं को फिर से प्रतिष्ठित किया गया । 1559 से 1600 ई. के बीच मदुरई के नायक प्रधानमंत्री आर्यनाथ मुदालियार ने मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू कराया जिसे आगे चलकर कई लोगों ने आगे बढ़ाया ।

देवी मीनाक्षी को मां पार्वती का अवतार माना जाता है । मंदिर मुख्य रुप से देवी मीनाक्षी को समर्पित है परन्तु सुंदरेश्वरर के रुप में महादेव भी यहां विराजमान हैं । पौराणिक कथा के मुताबिक मदुरई के पांड्य राजा मलयध्वज और उनकी पत्नी कंचनमाला ने संतान प्रप्ति के लिए कई यज्ञ किए।

आँख मछली की थी

अंतिम यज्ञ की अग्नि से तीन वर्ष की बालिका प्रकट हुई जिसकी आंखें मछली की तरह थी…इसलिए उनका नाम मीनाक्षी पड़ा। बाद में ये रहस्य खुला कि अपने पिछले जीवन में रानी कंचनमाला को दिए गए वचन का सम्मान करने के लिए राजकुमारी मीनाक्षी के रुप में मां पार्वती अवतरित हुई हैं ।मां पार्वती शक्ति स्वरूपा हैं। शायद इसीलिए मीनाक्षी अवतार में भी वो शत्रु संहारक दिखती हैं। मदुरै पर शासन से पहले ही उन्होंने राज्य के कई शत्रुओं का संहार किया।

शासन संभाला

स्थानीय साहित्य और लोककथाओं के अनुसार बड़ी होने पर राजकुमारी मीनाक्षी ने राज्य का शासन संभाला और उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली । बाद में भगवान शंकर सुंदरेश्वर के रुप में अवतरित हुए और राजकुमारी मीनाक्षी से विवाह रचाया । कहा जाता है कि स्वयं भगवान विष्णु की देखरेख में ये विवाह संपन्न हुआ और तीनों लोकों के निवासी इसमें शामिल हुए ।

कहा जाता है कि देवराज इंद्र के कारण भगवान विष्णु को बैकुंठ धाम से मदुरई पहुंचने में विलंब हो गया । इस दौरान स्थानीय देवता ने विवाह के विधि विधान को आगे बढ़ाया। इससे भगवान विष्णु क्रोधित होकर अलगार कोइल पर्वत पर बस गए और मदुरई न आने की प्रतिज्ञा की । हालांकि बाद में देवताओं ने उन्हें मना लिया और उन्होंने सुंदरेश्वरर और मीनाक्षी का पाणिग्रहण कराया । सुंदरेश्वर और मीनाक्षी की शादी का इस शहर से इतना गहरा नाता है कि आज भी यहां की लोक परंपराओं में ये कई रूपों में झलकता है। इस शादी से जुड़े किस्सों की भी यहां कोई कमी नहीं।

इसीलिए आज भी त्यौहार की शोभायात्रा में इंद्र के वाहन को स्थान मिलता है । बाद में देवी मीनाक्षी ने भी भव्य मंदिर का निर्माण कार्य शुरू कराया ।

कभी न खत्म होने वाली आस्था….भावों की पराकाष्ठा….दर्शन की दिव्यता….और माता का वैभव जो लौकिक होते हुए भी अलौकिकता का एहसास कराता है…….अगर आप भी इसका साक्षात्कार करना चाहते हैं तो आपको एक बार मीनाक्षी अम्मा के दर्शन के लिए आना पड़ेगा।





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