महाकालेश्वर की भस्म आरती का राज़

June 13, 20171min8770

 

उज्जैन आस्था का नगर है… उज्जैन मंदिरों को शहर है… शहर में इतने मंदिर हैं कि एक दिन में सभी मंदिरों के दर्शन संभव नहीं… मंदिरों में संरक्षित प्राचीन शिल्पकला, यहां आने वालों को इतिहास की समृद्धि का बोध कराता है। आस्था हो या इतिहास, इसमें दिलचस्पी रखने वालों के लिए ये शहर तमाम जिज्ञासाओं को शांत करने वाला है।

महकलेश्वेर मंदिर और भस्म आरती 

शिवजी के सामने नंदीगण की पाषाण प्रतिमा है… महाकालेश्वर की दिन में तीन बार पूजा, श्रृंगार और भोग से अर्चना होती है… ब्रह्म मुहूर्त में महाकालेश्वर का पूजन भस्म से किया जाता है जो किसी मृतक की चिता से लाया जाता है… पूजन का ये कार्य स्वयं महंत करते हैं.. इसके बाद पहली सरकारी पूजा सुबह आठ बजे होती है… फिर दोपहर और शाम में पूजा होती है… सुबह और शाम में होने वाली पूजा में सबसे ज्यादा श्रद्धालु शामिल होते हैं।

वर्तमान में महाकाल की भस्‍म आरती प्रावधान है , आरती में कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़ियों को जलाकर तैयार किये गए भस्‍म का प्रयोग किया जाता है।

क्यों होती है भस्म आरती
ऐसी मान्यता है कि वर्षों पहले श्मशान के भस्‍म से भूतभावन भगवान महाकाल की भस्‍म आरती होती थी लेकिन अब यह परंपरा खत्म हो चुकी है और अब कंडे के बने भस्‍म से आरती श्रृंगार किया जा रहा है।


  • आरती का नियम 

    इस आरती का एक नियम यह भी है कि इसे महिलाएं नहीं देख सकती हैं। इसललिए आरती के दौरान कुछ समय के लिए माहिलाओं को घूंघट करना पड़ता है।
    आरती के दौरान पुजारी एक वस्‍त्र धोती में होते हैं। इस आरती में अन्य वस्‍त्रों को धारण करने का नियम नहीं है। महाकाल की आरती भस्‍म से होने के पीछे ऐसी मान्यता है कि महाकाल श्मशान के साधक हैं और यही इनका श्रृंगार और आभूषण है।

भस्म का प्रसाद
महाकाल की पूजा में भस्‍म का विशेष महत्व है और यही इनका सबसे प्रमुख प्रसाद है। ऐसी धारणा है कि शिव के ऊपर चढ़े हुए भस्‍म का प्रसाद ग्रहण करने मात्र से रोग दोष से मुक्ति  मिलती है।

प्रकट हुए थे महाकाल

उज्‍जैन में महाकाल के प्रकट होने के विषय में कथा है कि दूषण नाम के असुर से लोगों की रक्षा के लिए महाकाल प्रकट हुए थे। दूषण का वध करने के बाद भक्तों ने जब शिव जी से उज्‍जैन में वास करने का अनुरोध किया तब महाकाल ज्योतिर्लिंग प्रकट हुए थे।

आरती के लिए ऑनलाइन बुकिंग 

महाकाल की तड़के 4 बजे होने वाली भस्म आरती दर्शन के लिए श्रद्घालु 30 अप्रैल से ऑनलाइन बुकिंग कर सकेंगे। मंदिर समिति ने ऑनलाइन अनुमति के लिए प्रति व्यक्ति 100 रुपए शुल्क निर्धारित किया है। देश-दुनिया के भक्त घर बैठे ऑनलाइन के साथ डेबिट व क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर अनुमति प्राप्त कर सकते हैं।

मंदिर की महिमा

महाकाल मंदिर, यहां का ज्योतिर्लिंग, पुराणों में वर्णित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है… महाकाल का ये मंदिर ना जाने कितनी बार बना और कितनी बार टूटा… महाकाल का मौजूदा मंदिर डेढ़ सौ वर्ष पूर्व राणोजी सिंधिया के मुनीम बाबा शेण बी ने बनवाया था… इसके निर्माण में मंदिर के पुराने अवशेषों का भी उपयोग हुआ है… महाकालेश्वर का वर्तमान मंदिर तीन भागों में बंटा हुआ है… सबसे नीचे तलघर में मुख्य ज्योतिर्लिंग, ऊपर ओंकारेश्वर और सबसे ऊपर नाग चंदेश्वर मंदिर है… नाग चंदेश्वर मंदिर साल में सिर्फ एक बार नागपंचमी के दिन खुलता है… महाकालेश्वर की ये स्वयंभू प्रतिमा विशाल है…

हरिसिद्ध मंदिर 

सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य थी हरसिद्धि देवी… बड़े गणेश मंदिर से शिप्रा नदी की तरफ जाने के रास्ते में कुछ ही दूरी पर है हरसिद्धि मंदिर। बेहद प्राचीन इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने हरसिद्धि देवी को ग्यारह बार अपना मस्तक काटकर चढ़ाया और हर बार मस्तक जुड़ गया… मंदिर के चारों तरफ चार द्वार हैं… मंदिर के दक्षिण में तलाब है… यहां अन्नपूर्णा देवी की मूर्ति भी है… परिसर में एक गुफा है जिसमें साधक, ध्यान करते हैं… मंदिर के ठीक सामने दो ऊंचा विशाल दीप स्तंभ है, जिनपर 726 दीपों के स्थान बनाए हुए हैं… नवरात्रि के समय यहां दीप जलाए जाते हैं जिसकी भव्यता देखते बनती है।… हरसिद्धि मंदिर के पास एक पतली –सी गली है जिसमें कई छोटे- छोटे मंदिर हैं… इनमें एक मंदिर सम्राट विक्रमादित्य का भी है… सम्राट विक्रमादित्य को समर्पित ये एकमात्र मंदिर है।

विज्ञान से रिश्ता

उज्जैन में राजा जय सिंह के द्वारा बनवाई गई वेधशाला जंतर- मंतर यंत्र महल के नाम से मशहूर है… बताते हैं कि राजा जय सिंह की ज्योतिष और विज्ञान में दिलचस्पी थी इसलिए वे चाहते थे कि भारतीय ज्योतिष में ग्रहों के गणितीय यथार्थ का संधान होना चाहिए… इसी मकसद से उन्होंने उज्जैन के साथ- साथ जयपुर, काशी, दिल्ली और मथुरा में वेधशालाओं का निर्माण कराया… समय के साथ मथुरा और काशी की वेधशालाएं ध्वस्त हो गई… जबकि उज्जैन की वेधशाला आज भी संरक्षित है… जिसमें बड़े आकार के पत्थर और ईंट से बने चार यंत्र हैं… इनमें काल, नवांश, दिशा, दिगंश और ग्रहों का सूक्ष्म ज्ञान हासिल किया जा सकता है… आज भी इसका उपयोग बताता है कि कई कालखंडों के बाद भी ये कितना प्रासंगिक है। इस वेधशाला के अवशेष आज भी यहां आने वालों के आकर्षण का केंद्र है… आस्था के साथ विज्ञान का ये रिश्ता बताता है कि धार्मिक नगरी उज्जैन का इतिहास कितना वैभवशाली रहा है।

कुंभ

एक ऐसा धार्मिक आयोजन जो आध्यात्म और भारतीय संस्कृति का जीता- जागता, धड़कता हुआ दस्तावेज है। भारतीय दर्शन में रचा-पगा ये धार्मिक आयोजन, दिव्यता की एक यात्रा है। आस्था का ये ऐसा अजूबा है, जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं और नहीं मिलती। गहरे अर्थों में यही भारत है और यही भारत का दर्शन है। स्त्री- पुरुष, बूढ़े- जवान, अमीर- ग़रीब, समर्थ- लाचार, क्या पूरब- पश्चिम, क्या उत्तर –दक्षिण… कुंभ सभी का है। … जो यहां तक आ गया, वही पा गया।

मिलती है पापों से मुक्ति

धर्म शास्त्रों में कुंभ स्नान का फल पापों से मुक्ति बताया गया है। कुंभ स्नान से पापों से मुक्ति मिले ना मिले, मन का मैल जरूर मिटेगा… मन की निर्मलता जरूर आएगी… ये ऐसा धार्मिक आयोजन है जो किसी के लिए दीवार खड़ी नहीं करता। जन आस्था का सैलाब माने गए कुंभ का यही तो प्राण तत्व है।

सांस्कृतिक और सामाजिक उद्देश्य भी

कुंभ का आयोजन किस काल में शुरू हुआ, ये अबतक अज्ञात है लेकिन अलग- अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले बहुलतावादी देश में कुंभ के आयोजन का सांस्कृतिक और सामाजिक उद्देश्य भी रहा है। इसके आयोजन की शुरुआत का अज्ञात होना भी इस बात का प्रमाण है कि कई कालखंडों को पार करता हुआ ये धार्मिक आयोजन हम तक पहुंचा है… ये ऐसा धार्मिक आयोजन है जिसमें देश के सारे शंकराचार्यों, विभिन्न मठों- अखाड़ों, मतों- संप्रदायों, वैरागियों- संतों का मिलन होता है… उनका आपस में संवाद होता है।… देश के अलग- अलग हिस्सों से आए अलग- अलग संस्कृतियों, भाषा- भाषी, खानपान से संबंध रखने वाले लाखों श्रद्धालुओं का आगमन इस आयोजन में अनेकता में एकता का रंग घोलते हैं।

अमृत कलश की बूंदें छलकी

कुंभ शब्द का अर्थ है- कलश या घड़ा। समुद्र मंथन में मिले अमृत कलश के लिए देवताओं और असुरों के बीच 12 दिनों तक संघर्ष हुआ इसलिए प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर कुंभ का आयोजन किया जाता है… जबकि प्रत्येक छह साल पर प्रयाग और हरिद्वार में अर्धकुंभ का आयोजन किया जाता है… मान्यता है कि अमृत कलश से अमृत की बूंदें उज्जैन में भी गिरी थी, इसलिए यहां कुंभ का आयोजन किया जाता है। यहां होने वाला कुंभ सिंहस्थ कुंभ के नाम से प्रसिद्ध है।

सिंहस्थ कुंभ भी कहते हैं 

प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में होने वाला कुंभ का आयोजन ग्रहों की दिशा पर निर्भर करता है… कुंभ मेले के आयोजन में सूर्य और बृहस्पति का खास योगदान माना जाता है… इसलिए गुरु जब सिंह राशि और सूर्य जब मेष राशि में प्रवेश करता है तब उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है और इसलिए इसे सिंहस्थ कुंभ भी कहा जाता है… शिप्रा के विशाल तट पर इसका आयोजन होता है… शिप्रा नदी और कुंभ जैसे विशाल आयोजन को लेकर भी धार्मिक मान्यता है।

 शिप्रा नदी 

स्कंद पुराण में उल्लेख है कि भारतवर्ष की सभी पवित्र नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है, जबकि शिप्रा इकलौती पवित्र नदी है जो उत्तरगामी है। कहा जाता है कि शिप्रा पहाड़ों से बहने वाली नदी है लेकिन मान्यता है कि ये धरती के कोख से जन्मी है। इसका एक नाम लोक सरिता भी है क्योंकि ये नदी ममत्व को प्रदर्शित करती है… इसलिए ममत्व से भरी इस नदी से अच्छा दूसरा कौन –सा स्थान हो सकता था?… जिसके आंचल में कुंभ जैसी धार्मिक, सांस्कृतिक और दर्शन की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा पीढ़ियों तक जिंदा रहेगी। वैसे भी जिस माटी को अमृत्व मिला हो… जिसे महाकाल का अभयदान मिला हो… संस्कृतियों के संरक्षण की उससे बेहतर जगह भला कौन हो सकती है?…..

 

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